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जाँनिसार

poets-Poem: 

जो दोस्त बचपन में रहा मेरा सरमाया बनकर
वो मुस्तक़बिल की होड़ में रह गया माज़ी बनकर ,,

ख़ुशग़वार थे लम्हें और ज़िन्दगी भी ख़ुशनुमा थी
मेरी झोली में वो आकर गिरा था नेमत बनकर ,,

रहगुज़र में उसकी हम कभी शामिल न हुए
या यूँ समझो कि
जाँनिसार करके भी इस काबिल न हुए ,,

दिल तो कई बार किया कि पूछूँ उस्से
वो था इश्क़ , दौलत , या कुछ और
जो आया हमारे दरमियाँ रुकावट बनकर ।।

                                     - जाँनिसार

 

ये दिल है , हाँ ये दिल ही तो है
ख़ुश हो तो लहरों से तेज़ बहता है
समा -ए -ग़म में ये ख़ामोश रहता है,,

मशक्कतों में घिरकर ये सुकून की तमन्ना करता है
तैश में होकर ये जुनून भी पैदा करता है
ये दिल है , हाँ ये दिल ही तो है,,

बेख़ौफ़ हो तो बेबाक़ हो जाता है
और कभि धीमी सी आहट से ये काँप जाता है

धड़कनो की रफ़्तार से धड़कता जाता है
फिर किसी मोइयन रोज़ ये थम जाता है
ये दिल है , हाँ ये दिल ही तो है ।।

                                        - जाँनिसार

 

देखते ही ख़त तेरा इज़हार -ए -मौहब्बत समझ बैठे
पढ़कर जो तूने लिखा था सारे ग़ुमान गवाँ बैठे ,,

वो बेबसी थी , हम बेरुख़ी समझ बैठे
सज़ा का हक़दार था कोई और
हम ख़ुद को गुनाहगार समझ बैठे ।।

                                          - जाँनिसार

 

जिसके लिए ज़माने से बेरुख़ी की
वही बेरहम अश्कों का सबब बन गया

क़ीमत जो ज़ालिम ने दिल की लगाई तो
सारी ज़मीन ,आसमान और समुन्दर भी थम गया

आजिज़ भी इल्ज़ाम सर लेकर
आशिक़ी को दिल्लगी का नाम दे गया ।।

                                              - जाँनिसार

 

आरज़ू -ए -दिल थी कि बस एक मुलाक़ात हो
अब यूँ लगता है कि ता उम्र तेरा साथ हो ।।

                                                - जाँनिसार

 

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