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Ek Vyatha Kisan ki / एक व्यथा किसान की..

poets-Poem: 

सूखे को देख सुख जाती है सब उम्मीदें
घर परिवार को चलाना भी भारी
रोजी रोटी की मारा- मारी
सब आश का निराशा में बदल जाना
टूट कर उम्मीदों का बिखर जाना
अकल्पनीय कल्पनाओ में जीना
बारिश ना होने तक बस उम्मीद लगाना
अगर बारिश हुई तोह इस बार
साहूकार से लिया सब कर्ज उतारूंगा
बच्चों के लिए नए कपड़े
और
रसोई का पूरा सामान लाऊंगा

धराशाही सब कल्पनाये हो जाती है अगर वक़्त पर बारिश ना हो तो..
बस चले तो जब जब जरूरत हो
तब तब बारिश कर दूं
बादलो को रस्सी बाँध वश में कर
नीचे खींच
बरखा कर दूं
तरसती धरा को तर-बतर कर दूं
पर अफसोस के हाथ मे कुछ नही
कुदरत के नियम अटूट
कहीं पानी से परिपूर्ण धरा
तो कहीं पानी को तरसती धरा..

में किसान..मेरी व्यथा मेरे साथ...

[..भगत..]

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