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New Year Poem / नववर्ष कविता

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समन्दर की एक कश्ती की तरह है,
दूर तक किनारा नजर नहीं आता,
भंवरों में उलझी है दुनिया की नाव,
कहीं भी ठिकाना नजर नहीं आता|

साल चला गया हम वो ही रह गये,
पत्ते झड़ गये हम शजर ही रह गये,
उम्मीद हम कल और नई बनायेंगे,
पर जिंदगी का इशारा समझ नहीं आता|

वादे, इरादे, झूठ, ईर्ष्या ये सब क्या है ?
दुनियादारी का ये तमाशा समझ नहीं आता|

मैं जैसा हूँ मुझे वैसा ही रहने दो,
पल-पल बदलने वाली दुनिया में,
मैं क्या बनूं....
मुझे खुद समझ नहीं आता|

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